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Saturday, 9 February 2013



   

आज मेरा फिरसे मन उब गया
इस दुनिया की मोह माया से फिर मेरा मन उठ गया
और एक लम्बे इन्तेकाल के बाद वापिस मेरा ऐसा जी कर गया
जो अपना कलम उठाके एक नयी दुनिया बनाने का मन बन गया

एक नयी दुनिया की विचित्र चित्र धुंधली सी दिखने लगी
और अचानक मेरी सोच एक नए रस्ते पे चलने लगी
ऐसा लगा ख्यालो की बारिश मेरे मन  पर गिरने लगी
क्यूँकी थी जो तस्वीर धुंधली वो भीनी भीनी सी अब दिखने लगी

अब मैं उस तस्वीर को थोडा थोडा पहचानने लगा था
बेशक आँखों से देख पा रहा था पर समझ नहीं आ रहा था
और खुद ही से बार बार ये सवाल उठा रहा था
की अवनीश तू कैसी तस्वीर बना रहा है जो खुद ही की सोच में उलझे जा रहा है

जैसे जैसे समय का चक्र चलता गया
वैसे ही तस्वीर का एक के बाद एक नया रंग निखरता गया
और मुझे इस तस्वीर को देखने का नया पहलूँ मिलता गया
एक बंद ताले की मुझे चाब्बी जैसे मिल ही गयी
और इस तस्वीर की गुथी सुलझाने की मुझे एक तरकीब सूझ गयी
क्यूंकि आँखों के साथ मेरे मन को भी ये तस्वीर दिख ही गयी

तस्वीर बहुत खुबसूरत थी
कभी न देखे रंगों के मेल से बनी थी
पर मैंने सोचा, क्यूँ मेरी सोच से परे थी
फिर आवाज़ गूंजी की गलती तो मेरी थी
मैंने एक ऐसी तस्वीर बनाने की कोशिश करी थी
जो हकीकत से मीलो दूर , बहुत दूर खड़ी थी







क्यूँकी,
यहाँ सिर्फ हसी ही हसी थी
और आसूओ की कमी थी
यहाँ कोई दौड़ नहीं चल रही थी
जिसमे सबको आगे निकलने की पढ़ी थी
क्यूँकी,
यहाँ भूखे के नाम भी अन्न के दो दाने थे
और बेघरो के भी ठिकाने थे
चारो तरफ सिर्फ ख़ुशी के नजराने थे
क्यूँकी,
यहाँ सिर्फ अमीर नहीं
गरीबो का भी बोल बाला था
सिर्फ पुरुष नहीं
नारी को भी बराबर का दर्जा दिया जाता था
क्यूँकी,
हर कोई नफरत जैसे लफ़्ज़ों से अनजाना था
हर मानस एक दूसरे को अपना मानता था
कोई यहाँ हथियार नहीं उठाता था
बस एक दूसरे को प्यार से गले लगाता था

अब आँखे खोली तो फिर वास्तविकता में आ गया
एकदम से सनाटे को शोर ने भगा दिया
अपने खयालों को किसी कोणे में मैंने छुपा दिया
इच्छाओं को कही गहराई में दबा दिया
एक और तस्वीर को मैंने अपने मन के कैनवास से मिटा दिया
और ऐसे ही मैंने एक और तस्वीर को भुला दिया
और ऐसे ही मैंने एक और तस्वीर को भुला दिया

- अवनीश गुप्ता 



Friday, 7 September 2012

                     
                 'क्यूँ आज'


आज अपने आप को शब्दों के दरमियाँ बया करने का फिर मन कर गया 
नजाने क्यूँ आज फिरसे लिखने का जी कर गया 
ऐसा लग रहा है जैसे मेरे साथ बहुत कुछ है घट गया 
जो आज एक दम से फिर कलम  उठाने का मन कर गया 
नजाने क्यूँ आज फिरसे लिखने का जी कर गया 
पता नहीं क्यूँ मन में एक अलग सी चंचलता है आज 
पता नहीं क्यूँ दिल में एक अलग सी हलचल है आज 
कुछ है नहीं बताने को फिर भी आज क्यूँ कुछ बताने को जी कर गया 
नजाने क्यूँ आज फिरसे लिखने का जी कर गया 
ऐसा लगा जैसे कुछ न घट के भी घट गया 
इस अन्घठी घटना का मेरे पर ऐसा असर पढ़ गया 
जो न होके भी मेरे दिल को लग गया 
और चुपके से जाके मेरे मन में बस गया 
नजाने क्यूँ  आज  फिरसे लिखने का जी कर गया 
शायद ऐसे ही इस मन का आज मन कर गया 
शायद ऐसे ही आज दिल कर गया 
जो आज फिरसे लिखने का जी कर गया 
जो आज फिरसे लिखने का जी कर गया 

- अवनीश गुप्ता  

Monday, 20 August 2012




It was quarter past twelve on a Wednesday afternoon. The ambience was very serene and soothing. People around on all the other tables were engaged in chatting with each other without any showcase of too much of attention seeking emotions but these two had been sitting there quietly on a small round table for two for quite some time now. Breaking the ice she asked him '' Tell me what love for you is?'' Finally taking his eyes of her and breaking away from his thoughts he took a deep breath, smiled and said '' The very fact that I can sit here with you for hours just staring at you lost in my thoughts , without being uneasy , not feeling the need to necessarily say something and yet enjoying your presence . For me that is love.''